काशी का अनायास सफर एक कहानी — A Journey I Never Planned | Story Behind Varanasi | A Special Story About Varanasi |
वाराणसी की ओर
मैं प्रातः स्नान कर, तैयार होकर वाराणसी के सफर पर निकल पड़ा।
यह यात्रा पहले से निर्धारित नहीं थी। अचानक ऑफिस के काम से वाराणसी जाना पड़ा। इसलिए मैंने जल्दी-जल्दी अपनी जरूरत का कुछ सामान और ऑफिस से संबंधित जरूरी फाइलें अपने बस्ते में रखीं और घर से निकल पड़ा।
सबसे पहले मैं अपने नजदीकी रेलवे स्टेशन **सहतवार** पहुँचा। कुछ देर इंतजार करने के बाद *वाराणसी इंटरसिटी एक्सप्रेस* स्टेशन पर आ पहुँची। मैं ट्रेन में चढ़ा, एक जगह देखकर अपना बस्ता रखा और बैठ गया।
लेकिन यहाँ एक दिलचस्प बात थी।
मैं वाराणसी जाने के लिए निकला था, लेकिन ट्रेन में बैठने के बाद मुझे इंतजार था **बलिया स्टेशन** का।
आप सोच रहे होंगे कि जब मुझे वाराणसी ही जाना था तो फिर बलिया का इंतजार क्यों?
तो इसकी भी एक वजह थी।
मेरे सहकर्मी और मेरे करीबी **चौबे जी** कुछ जरूरी फाइलें लेकर बलिया स्टेशन पर मेरा इंतजार कर रहे थे। मुझे बलिया पहुँचकर उनसे वे फाइलें लेनी थीं और फिर उन्हें अपने वाराणसी कार्यालय तक पहुँचाकर संबंधित काम पूरा करना था।
इसलिए इस सफर का पहला पड़ाव मेरे लिए बलिया ही था।
वाराणसी का सफर मैंने इससे पहले भी कई बार किया था, लेकिन यह यात्रा मेरे लिए कुछ अलग महत्व रखती थी।
क्योंकि इस बार मुझे पहली बार अपने किसी **सीनियर अधिकारी का सामना अकेले** करना था।
शायद इसी वजह से मेरे भीतर थोड़ी घबराहट और डर था।
मन में कई तरह के सवाल चल रहे थे—
*क्या बात होगी?*
*सीनियर क्या पूछेंगे?*
*मैं अपनी बात सही तरीके से रख पाऊँगा या नहीं?*
लेकिन इन तमाम सवालों के बावजूद मैंने अपना आत्मविश्वास बनाए रखा और खुद से कहा—
**“जो होगा, देखा जाएगा। बस अपना काम ईमानदारी से करना है।”**
और फिर मेरी ट्रेन अपनी गति से वाराणसी की ओर बढ़ चली।
इस यात्रा में मुझे कई ऐसी अनोखी घटनाएँ देखने को मिलीं, जिन्हें शायद मैं किसी सामान्य यात्रा में कभी महसूस नहीं कर पाता।
तभी मेरे मन में एक विचार आया—
**अगर किसी सफर का वास्तव में आनंद लेना हो, अगर रास्ते में लोगों को देखना हो, जिंदगी को करीब से समझना हो और कुछ नया सीखने की इच्छा हो, तो कभी-कभी हमें रेलगाड़ी के जनरल डिब्बे में सफर जरूर करना चाहिए।**
क्योंकि जनरल डिब्बा सिर्फ यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने वाला डिब्बा नहीं है।
वह अपने भीतर **हजारों कहानियाँ लेकर चलता है।**
उसमें समाज का लगभग हर वर्ग दिखाई देता है।
कोई अपने परिवार से मिलने जा रहा होता है, कोई रोजगार की तलाश में, कोई अपने गाँव लौट रहा होता है और कोई किसी अनजान शहर की ओर अपने भविष्य की तलाश में निकल पड़ा होता है।
उस दिन भी मैंने जनरल डिब्बे में तरह-तरह के लोगों को देखा।
कुछ लोग अपने समय को गुजारने के लिए कानों में ईयरफोन लगाए गाने सुन रहे थे।
कुछ लोग आपस में बातचीत कर रहे थे।
कुछ लोग खिड़की से बाहर देखते हुए शायद अपने गंतव्य के आने का इंतजार कर रहे थे।
और कुछ लोग ऐसे भी थे, जो भीड़ के बीच बैठे हुए भी अपने ही विचारों की दुनिया में खोए हुए थे।
मैं उन सभी लोगों को देख रहा था।
लेकिन धीरे-धीरे मुझे महसूस हुआ कि मैं सिर्फ उन्हें देख नहीं रहा था, बल्कि **उनकी कहानियों की कल्पना भी करने लगा था।**
किसी के चेहरे पर खुशी थी तो उसके पीछे कोई वजह रही होगी।
किसी के चेहरे पर चिंता थी तो उसके पीछे भी कोई कहानी रही होगी।
किसी की आँखों में उम्मीद थी तो कोई शायद अपनी जिंदगी की किसी नई शुरुआत की ओर जा रहा था।
मैं इन सबको अपनी कल्पना से जोड़ने लगा।
और तभी मेरे मन में विचार आया कि क्यों न इस पूरे सफर की दास्तान को अपनी कलम के माध्यम से आप सभी के सामने रखा जाए।
शायद यही मेरी यात्राओं की सबसे खूबसूरत बात है—
**मैं सिर्फ सफर नहीं करता, मैं सफर को महसूस करने की कोशिश करता हूँ।**
लेकिन इस यात्रा में कुछ ऐसे दृश्य भी देखने को मिले, जिन्होंने मेरे मन को भीतर तक छू लिया।
ट्रेन अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी और मैं खिड़की से बाहर देख रहा था।
रेल की पटरियों के किनारे मैंने कुछ छोटे-छोटे बच्चों को देखा।
उनके शरीर पर ठीक से कपड़े नहीं थे और पैरों में पहनने के लिए चप्पल तक नहीं थी।
वे बच्चे पटरियों के किनारे चुपचाप और मायूस बैठे हुए थे।
ट्रेन कुछ ही क्षणों में उन्हें पीछे छोड़कर आगे निकल गई, लेकिन उनका वह दृश्य मेरे मन में वहीं ठहर गया।
मैं सोचने लगा—
**एक तरफ हम अपने सफर में सुविधा, सीट और गंतव्य की चिंता कर रहे हैं, और दूसरी तरफ कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जिनके लिए जिंदगी की सबसे बड़ी जरूरतें ही अभी अधूरी हैं।**
शायद यात्राएँ हमें सिर्फ नए स्थानों तक नहीं ले जातीं।
कभी-कभी वे हमें **अपने ही समाज की ऐसी तस्वीर दिखा देती हैं, जिसे हम रोजमर्रा की जिंदगी में नजरअंदाज कर देते हैं।**
इन विचारों में डूबा हुआ मैं कब अपने गंतव्य के करीब पहुँच गया, पता ही नहीं चला।
अब समय था अपनी सोच को थोड़ा विराम देने का।
मैंने अपना बस्ता संभाला और **वाराणसी रेलवे स्टेशन** पर उतर गया।
जिस काम के लिए मैं वाराणसी आया था, अब उसकी बारी थी।
मुझे लगा था कि ऑफिस के इस काम में काफी समय लग सकता है, लेकिन परिस्थितियाँ मेरी उम्मीद के बिल्कुल विपरीत निकलीं।
जिस काम को लेकर मैं इतना दूर आया था, वह काम **कुछ ही मिनटों में पूरा हो गया।**
मैंने राहत की साँस ली।
मन में एक हल्की-सी मुस्कान आई और लगा कि जिस काम को लेकर सुबह से इतनी चिंता कर रहा था, वह तो पलक झपकते ही पूरा हो गया।
लेकिन शायद इस सफर की असली कहानी ऑफिस का वह काम नहीं था।
असली कहानी तो वह थी जो मैंने **रास्ते में देखी, महसूस की और अपने मन में संजो ली।**
यह सफरनामा अभी पूरा नहीं हुआ है।
इस यात्रा की कुछ बातें, कुछ अनुभव और कुछ भावनाएँ ऐसी हैं, जिन्हें मैं शायद कभी बाद में आपके साथ साझा करूँगा।
फिलहाल अपनी लेखनी को यहीं विराम देता हूँ।
मुझे आशा है कि मेरी यह छोटी-सी यात्रा-कथा आपको पसंद आएगी और आप मेरे साथ इस सफर को शब्दों के माध्यम से महसूस कर पाए होंगे।
**सफर जारी रहेगा...**
- आदर्श सिंह

Comments
Post a Comment