एक शहर की खामोश बैठक।खामोश शहर।शहर के धरोहरों की एक बैठक।A Silent Meeting of a City.
एक शहर की ख़ामोश बैठक - रात का दूसरा पहर था। शहर की गलियाँ शांत थीं। लोगों के घरों की बत्तियाँ बुझ चुकी थीं, लेकिन शहर की कुछ पुरानी धरोहरों की आँखों में आज भी नींद नहीं थी। वर्षों से सीने में दबा दर्द आखिर आज शब्द बनकर बाहर आने वाला था। इसलिए शहर के पुराने अस्पताल, सड़कें, सरकारी विद्यालय, पुस्तकालय, पार्क, नालियाँ, पुल और बिजली के खंभे एक जगह इकट्ठा हुए। यह कोई साधारण बैठक नहीं थी, बल्कि उन चीज़ों की सभा थी जिनके कंधों पर पूरा शहर टिका था, लेकिन जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। बैठक की शुरुआत सड़क ने की। उसकी आवाज़ में थकान भी थी और शिकायत भी। उसने चारों ओर देखते हुए पूछा, **"क्या तुममें से किसी ने 'विकास' को देखा है? लोग रोज़ मेरे ऊपर से गुज़रते हैं। मेरे नाम पर करोड़ों के बजट बनते हैं, भाषण दिए जाते हैं, फीते काटे जाते हैं, लेकिन मैं आज भी गड्ढों से भरी हूँ। हर बरसात में मैं सड़क कम, तालाब ज़्यादा बन जाती हूँ। कितने लोगों ने मेरी गोद में दम तोड़ा, कितने अपनों को खो बैठे, लेकिन किसी ने मेरे घाव भरने की ज़रूरत नहीं समझी। क्या सचमुच विकास नाम का कोई व्यक्ति होता भी है?...