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Showing posts from August, 2026

एक शहर की खामोश बैठक।खामोश शहर।शहर के धरोहरों की एक बैठक।A Silent Meeting of a City.

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  एक शहर की ख़ामोश बैठक -  रात का दूसरा पहर था। शहर की गलियाँ शांत थीं। लोगों के घरों की बत्तियाँ बुझ चुकी थीं, लेकिन शहर की कुछ पुरानी धरोहरों की आँखों में आज भी नींद नहीं थी। वर्षों से सीने में दबा दर्द आखिर आज शब्द बनकर बाहर आने वाला था। इसलिए शहर के पुराने अस्पताल, सड़कें, सरकारी विद्यालय, पुस्तकालय, पार्क, नालियाँ, पुल और बिजली के खंभे एक जगह इकट्ठा हुए। यह कोई साधारण बैठक नहीं थी, बल्कि उन चीज़ों की सभा थी जिनके कंधों पर पूरा शहर टिका था, लेकिन जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। बैठक की शुरुआत सड़क ने की। उसकी आवाज़ में थकान भी थी और शिकायत भी। उसने चारों ओर देखते हुए पूछा, **"क्या तुममें से किसी ने 'विकास' को देखा है? लोग रोज़ मेरे ऊपर से गुज़रते हैं। मेरे नाम पर करोड़ों के बजट बनते हैं, भाषण दिए जाते हैं, फीते काटे जाते हैं, लेकिन मैं आज भी गड्ढों से भरी हूँ। हर बरसात में मैं सड़क कम, तालाब ज़्यादा बन जाती हूँ। कितने लोगों ने मेरी गोद में दम तोड़ा, कितने अपनों को खो बैठे, लेकिन किसी ने मेरे घाव भरने की ज़रूरत नहीं समझी। क्या सचमुच विकास नाम का कोई व्यक्ति होता भी है?...

काशी का अनायास सफर एक कहानी — A Journey I Never Planned | Story Behind Varanasi | A Special Story About Varanasi |

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वाराणसी की ओर मैं प्रातः स्नान कर, तैयार होकर वाराणसी के सफर पर निकल पड़ा। यह यात्रा पहले से निर्धारित नहीं थी। अचानक ऑफिस के काम से वाराणसी जाना पड़ा। इसलिए मैंने जल्दी-जल्दी अपनी जरूरत का कुछ सामान और ऑफिस से संबंधित जरूरी फाइलें अपने बस्ते में रखीं और घर से निकल पड़ा। सबसे पहले मैं अपने नजदीकी रेलवे स्टेशन **सहतवार** पहुँचा। कुछ देर इंतजार करने के बाद *वाराणसी इंटरसिटी एक्सप्रेस* स्टेशन पर आ पहुँची। मैं ट्रेन में चढ़ा, एक जगह देखकर अपना बस्ता रखा और बैठ गया। लेकिन यहाँ एक दिलचस्प बात थी। मैं वाराणसी जाने के लिए निकला था, लेकिन ट्रेन में बैठने के बाद मुझे इंतजार था **बलिया स्टेशन** का। आप सोच रहे होंगे कि जब मुझे वाराणसी ही जाना था तो फिर बलिया का इंतजार क्यों? तो इसकी भी एक वजह थी। मेरे सहकर्मी और मेरे करीबी **चौबे जी** कुछ जरूरी फाइलें लेकर बलिया स्टेशन पर मेरा इंतजार कर रहे थे। मुझे बलिया पहुँचकर उनसे वे फाइलें लेनी थीं और फिर उन्हें अपने वाराणसी कार्यालय तक पहुँचाकर संबंधित काम पूरा करना था। इसलिए इस सफर का पहला पड़ाव मेरे लिए बलिया ही था। वाराणसी का सफर मैंने इससे पहले भी कई बार...

बलिया समाचार 6 अगस्त 2026: रसड़ा विधायक उमाशंकर सिंह का निधन, ब्रेन ट्यूमर से लंबी जंग के बाद दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में ली अंतिम सांस | Ballia News Today (6 August 2026): Rasra MLA Umashankar Singh Passes Away at Delhi's Fortis Hospital After Long Battle with Brain Tumor

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 बलिया, 6 अगस्त। बलिया की रसड़ा विधानसभा से लगातार तीन बार विधायक और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के वरिष्ठ नेता उमाशंकर सिंह का बुधवार शाम लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उन्होंने दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से पूरे बलिया जनपद और प्रदेश की राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई। जानकारी के अनुसार, उमाशंकर सिंह पिछले लगभग तीन वर्षों से ब्रेन ट्यूमर से जूझ रहे थे। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद उनकी सर्जरी भी हुई थी। इसके बाद से उनका इलाज लगातार विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में चल रहा था, लेकिन स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका। अंततः 5 अगस्त की शाम इलाज के दौरान उनका निधन हो गया। उमाशंकर सिंह उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा के एकमात्र विधायक थे। उनके निधन से पार्टी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। बसपा प्रमुख मायावती ने उन्हें पार्टी का समर्पित, ईमानदार और लोकप्रिय नेता बताते हुए गहरा शोक व्यक्त किया। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित विभिन्न दलों के नेताओं ने भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। बलिया के लोगों के बीच उ...

बलिया के राजपूतों का इतिहास: गौरव, वंश और विरासत | History of Rajputs in Ballia: Legacy, Clans & Heritage

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 उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर स्थित बलिया केवल "बागी बलिया" के नाम से ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यह अपनी समृद्ध सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विरासत के लिए भी जाना जाता है। इस विरासत में राजपूत समाज का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सदियों से विभिन्न राजपूत वंशों ने इस क्षेत्र में निवास किया, कृषि और स्थानीय प्रशासन को मजबूत किया तथा समय-समय पर विदेशी आक्रमणों और स्वतंत्रता आंदोलनों में अपनी भूमिका निभाई। हालांकि उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेख यह नहीं बताते कि पूरे बलिया जिले पर किसी एक राजपूत वंश का निरंतर शासन रहा हो, लेकिन अनेक राजपूत कुलों ने यहाँ ज़मींदारी, सैन्य नेतृत्व और सामाजिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान बनाया। बलिया में राजपूतों का आगमन कब और कैसे हुआ? | When and How Did Rajputs Arrive in Ballia? इतिहासकारों के अनुसार 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच उत्तर भारत में हुए राजनीतिक परिवर्तनों के बाद अनेक राजपूत कुल पश्चिमी और मध्य भारत से पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार की ओर आए। इनमें से कई परिवार वर्तमान बलिया क्षेत्र में बस गए। समय के साथ इन परिवारों ने गाँव बसाए, कृषि भूमि विकस...