एक शहर की खामोश बैठक।खामोश शहर।शहर के धरोहरों की एक बैठक।A Silent Meeting of a City.
एक शहर की ख़ामोश बैठक -
रात का दूसरा पहर था। शहर की गलियाँ शांत थीं। लोगों के घरों की बत्तियाँ बुझ चुकी थीं, लेकिन शहर की कुछ पुरानी धरोहरों की आँखों में आज भी नींद नहीं थी। वर्षों से सीने में दबा दर्द आखिर आज शब्द बनकर बाहर आने वाला था। इसलिए शहर के पुराने अस्पताल, सड़कें, सरकारी विद्यालय, पुस्तकालय, पार्क, नालियाँ, पुल और बिजली के खंभे एक जगह इकट्ठा हुए। यह कोई साधारण बैठक नहीं थी, बल्कि उन चीज़ों की सभा थी जिनके कंधों पर पूरा शहर टिका था, लेकिन जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था।
बैठक की शुरुआत सड़क ने की। उसकी आवाज़ में थकान भी थी और शिकायत भी। उसने चारों ओर देखते हुए पूछा, **"क्या तुममें से किसी ने 'विकास' को देखा है? लोग रोज़ मेरे ऊपर से गुज़रते हैं। मेरे नाम पर करोड़ों के बजट बनते हैं, भाषण दिए जाते हैं, फीते काटे जाते हैं, लेकिन मैं आज भी गड्ढों से भरी हूँ। हर बरसात में मैं सड़क कम, तालाब ज़्यादा बन जाती हूँ। कितने लोगों ने मेरी गोद में दम तोड़ा, कितने अपनों को खो बैठे, लेकिन किसी ने मेरे घाव भरने की ज़रूरत नहीं समझी। क्या सचमुच विकास नाम का कोई व्यक्ति होता भी है?"**
सड़क की बात सुनकर अस्पताल की आँखें भर आईं। उसने भारी मन से कहा, **"बहन, अगर विकास सच में होता तो शायद मेरी हालत भी ऐसी न होती। मेरी दीवारों की दरारें हर दिन बढ़ रही हैं। वार्डों में मरीज ज़मीन पर लेटकर इलाज करवाते हैं। मशीनें धूल खा रही हैं, दवाइयाँ अधूरी हैं, डॉक्टर कम हैं और उम्मीदें टूट चुकी हैं। मैं हर रोज़ किसी माँ को अपने बच्चे के लिए रोते देखता हूँ, किसी बेटे को अपने पिता की साँसें बचाने के लिए भागते देखता हूँ। मेरे आँगन में दर्द बहुत आता है, लेकिन राहत बहुत कम पहुँचती है।"**
सरकारी विद्यालय अब तक चुप था। उसकी आवाज़ काँप रही थी। उसने कहा, **"कभी मेरी घंटी की आवाज़ पूरे मोहल्ले में गूँजती थी। बच्चों की हँसी मेरी पहचान थी। आज मेरी दीवारें उखड़ रही हैं, छत टपकती है, ब्लैकबोर्ड टूट चुका है। भाषणों में कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य हैं, लेकिन उनके भविष्य का घर आज भी अतीत की तरह टूटा हुआ खड़ा है।"**
इतने में पुस्तकालय बोला, **"मैंने इस शहर को न जाने कितने अधिकारी, शिक्षक, लेखक और कवि दिए हैं। कभी मेरी अलमारियों के सामने जगह नहीं मिलती थी। आज मेरी किताबें धूल से ढकी हुई हैं। लगता है ज्ञान की जगह अब सिर्फ़ घोषणाओं ने ले ली है।"**
पार्क ने गहरी साँस भरते हुए कहा, **"मैं बच्चों की खिलखिलाहट के लिए बना था। बुज़ुर्गों की सुबह की मुस्कान मेरी पहचान थी। लेकिन अब मेरे झूले जंग खा चुके हैं, बेंचें टूट चुकी हैं और पेड़ भी जैसे किसी का इंतज़ार करते-करते थक गए हैं।"**
नालियाँ भी पहली बार बोल पड़ीं। उन्होंने कहा, **"जब तक हम साफ़ रहते हैं, कोई हमें देखता भी नहीं। लेकिन जैसे ही बारिश में शहर डूबता है, सबसे पहले दोष हमें दिया जाता है। हमारी सफ़ाई का बजट भी आता है, लेकिन शायद वह रास्ते में कहीं खो जाता है।"**
तभी पुराने पुल ने धीमी आवाज़ में कहा, **"मैं रोज़ लाखों उम्मीदों को एक किनारे से दूसरे किनारे पहुँचाता हूँ। मेरी उम्र बढ़ चुकी है। मेरे शरीर में दरारें पड़ चुकी हैं। मुझे डर अपने टूटने का नहीं, बल्कि उन मासूम ज़िंदगियों का है जो मुझ पर भरोसा करके गुज़रती हैं।"**
सभी की बातें सुनकर पूरा वातावरण भारी हो गया। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। सबकी आँखों में चमक आ गई। सड़क खुशी से बोली, **"लगता है विकास आ गया!"**
दरवाज़ा खुला।
लेकिन सामने विकास नहीं था।
वहाँ केवल नए चुनावी पोस्टर, बड़े-बड़े वादे और चमकदार घोषणाएँ रखी थीं।
कमरे में फिर वही सन्नाटा लौट आया।
सड़क ने सिर झुका लिया।
अस्पताल की आँखों से मानो अदृश्य आँसू बह निकले।
विद्यालय ने धीरे से कहा, **"शायद विकास को हमारी नहीं, सिर्फ़ चुनावों की तारीख़ याद रहती है।"**
तभी शहर के सबसे पुराने बरगद ने, जो अब तक चुपचाप सब सुन रहा था, धीमी आवाज़ में कहा—
**"बेटा... विकास तब नहीं होता जब दीवारों पर उसके पोस्टर लगते हैं। विकास तब होता है जब अस्पताल में कोई इलाज के अभाव में न मरे, जब सड़क पर कोई गड्ढे की वजह से अपनी जान न गंवाए, जब स्कूल में हर बच्चे के सपनों को पंख मिलें, जब पार्कों में फिर से बच्चों की हँसी लौट आए और जब शहर की हर धरोहर यह महसूस करे कि कोई उसकी भी चिंता करता है।"**
बरगद की बात सुनकर पूरी बैठक ख़ामोश हो गई।
उस रात किसी ने कुछ नहीं कहा।
सुबह हुई तो शहर पहले जैसा ही था—वही टूटी सड़कें, वही जर्जर अस्पताल, वही बदहाल स्कूल, वही सूखा पार्क, वही इंतज़ार...
फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि अब शहर की ख़ामोशी भी एक सवाल पूछ रही थी—
**"आख़िर विकास अब तक पहुँचा क्यों नहीं?"**
- आदर्श सिंह

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