लोकतंत्र की सबसे खतरनाक आदत “जब जनता ने प्रतिनिधि को राजा बना दिया” जब सवालों की जगह जयकारे गूँजने लगे।क्या लोकतंत्र तब कमजोर हो जाता है जब जनता अपने प्रतिनिधि को सेवक की जगह राजा मानने लगती है? पढ़िए सवालों, जयकारों और लोकतंत्र की असली ताकत पर एक विचारपूर्ण लेख।
सबसे बड़ी गलती शायद नेताओं की नहीं, बल्कि हम आम जनता की भी है। हमने लोकतंत्र में अपने प्रतिनिधियों को इतना ऊँचा स्थान दे दिया है कि धीरे-धीरे वे स्वयं को जनता से ऊपर समझने लगे हैं। हम भूल जाते हैं कि मंत्री, विधायक और सांसद कोई भगवान नहीं हैं। वे भी सामान्य लोग हैं, जिन्हें जनता ने अपने वोट के माध्यम से चुनकर सदन में भेजा है। उनका पद उन्हें जनता का मालिक नहीं, बल्कि जनता का प्रतिनिधि और सेवक बनाता है।
विडंबना यह है कि चुनाव के समय नेता जनता के दरवाजे पर आते हैं, हाथ जोड़ते हैं, वोट मांगते हैं और जनता से बड़े-बड़े वादे करते हैं। लेकिन चुनाव जीतने के बाद परिस्थितियाँ बदल जाती हैं। वही जनता, जिसके एक वोट ने उन्हें सत्ता तक पहुँचाया होता है, उनके आने की खबर सुनकर हजारों की भीड़ बनाकर उन्हें देखने पहुँच जाती है। लोग उनके साथ एक तस्वीर खिंचवाने के लिए उत्साहित होते हैं, उनका एक हाथ मिल जाना अपने लिए सौभाग्य समझते हैं और उनके नाम के नारे लगाने लगते हैं।
जब हम स्वयं किसी व्यक्ति को इतना असाधारण बना देंगे, तो स्वाभाविक है कि वह भी स्वयं को असाधारण समझने लगेगा। जब जनता अपने प्रतिनिधि के पीछे भागेगी, तो प्रतिनिधि जनता के पास आने की आवश्यकता क्यों महसूस करेगा? जब जनता सवाल पूछने के बजाय केवल जयकारे लगाएगी, तो जवाबदेही की उम्मीद किससे की जाएगी?
लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है। नेता जनता के वोट से चुने जाते हैं और जनता के हितों की रक्षा करना उनका कर्तव्य होता है। सड़क, अस्पताल, बिजली, पानी, शिक्षा और रोजगार किसी नेता का व्यक्तिगत उपकार नहीं हैं। ये जनता के अधिकार हैं। इन सुविधाओं के लिए जनता को किसी मंत्री या विधायक का आभारी होने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इन्हें उपलब्ध कराना शासन और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है।
सम्मान करना आवश्यक है, लेकिन सम्मान और अंधभक्ति में अंतर होता है। किसी नेता के अच्छे कार्यों की प्रशंसा की जानी चाहिए, लेकिन उसके गलत कार्यों पर प्रश्न भी पूछे जाने चाहिए। लोकतंत्र केवल तालियाँ बजाने से मजबूत नहीं होता, बल्कि सवाल पूछने वाली जनता से मजबूत होता है।
हमें यह समझना होगा कि नेता हमारे मालिक नहीं हैं। वे हमारे द्वारा चुने गए प्रतिनिधि हैं। उन्हें सम्मान देना हमारी संस्कृति हो सकती है, लेकिन उनसे जवाब मांगना हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है। जिस दिन आम जनता नेताओं को भगवान बनाना छोड़कर उन्हें जवाबदेह जनप्रतिनिधि के रूप में देखना शुरू कर देगी, उसी दिन लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ समझ में आएगा।
आखिरकार, लोकतंत्र में सत्ता किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती। सत्ता की असली ताकत जनता के पास होती है। नेता केवल उस शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए हमें नेताओं के पीछे भीड़ बनकर चलने के बजाय अपने अधिकारों और समस्याओं के साथ उनके सामने खड़ा होना चाहिए।
**क्योंकि लोकतंत्र में नेता बड़ा नहीं होता, जनता बड़ी होती है। नेता जनता का मालिक नहीं, जनता का प्रतिनिधि होता है।**
- आदर्श सिंह

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