जब गाँव की पुरानी यादें बोल उठीं—एक तालाब, बूढ़े बरगद और सूखे कुएँ की भावुक बातचीत, जिसमें गाँव का बीता हुआ समय जीवंत हो उठता है। यह कहानी बदलते गाँव, खोती हुई परंपराओं, प्रकृति, बचपन की यादों और आधुनिक जीवन के बीच छूटती ग्रामीण संस्कृति की संवेदनशील तस्वीर प्रस्तुत करती है। कभी जिन स्थानों पर लोगों की चहल-पहल होती थी, आज वहाँ खामोशी बस गई है। तालाब, बरगद और सूखा कुआँ अपने पुराने दिनों को याद करते हुए गाँव के बदलते स्वरूप पर सवाल उठाते हैं। पढ़िए एक भावनात्मक ग्रामीण कहानी जो आपको अपने गाँव, बचपन और बीते हुए खूबसूरत दिनों की याद दिला देगी।
जब गाँव की पुरानी यादें बोल उठीं ,तालाब, बरगद और सूखे कुएँ की आख़िरी बातचीत:-
गाँव के आखिरी छोर पर एक पुराना तालाब था। उसके किनारे वर्षों से खड़ा एक बूढ़ा बरगद का वृक्ष था और कुछ ही दूरी पर एक पुराना कुआँ, जो अब पूरी तरह सूख चुका था। समय ने इन तीनों को बूढ़ा कर दिया था, लेकिन इनके भीतर आज भी एक पूरा गाँव जीवित था—वह गाँव, जो कभी इनके आसपास साँस लिया करता था।
शाम का समय था। सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था और पूरे गाँव पर एक अजीब-सी खामोशी उतर रही थी। तालाब के किनारे अब न बच्चों की आवाज़ें थीं, न औरतों की बातचीत और न ही पानी में उठती लहरों की वह पुरानी हलचल। चारों तरफ घास और झाड़ियाँ फैल चुकी थीं। ऐसा लगता था मानो समय ने धीरे-धीरे उस जगह को लोगों की यादों से भी मिटा दिया हो।
तालाब अपने शांत पानी में आसमान को देख रहा था। शायद उसे अपने बीते हुए दिन याद आ रहे थे। उसे याद था कि कैसे सुबह होते ही गाँव की चहल-पहल उसके किनारों तक पहुँच जाती थी। गाँव की औरतें कपड़े लेकर आती थीं, बच्चे पानी के पास खेलते थे, कोई स्नान करता था तो कोई घंटों किनारे बैठकर अपने सुख-दुख की बातें करता था। बच्चों की हँसी से उसका पानी भी जैसे मुस्कुरा उठता था। उसे वह समय याद था जब वह केवल पानी का एक स्रोत नहीं था, बल्कि पूरे गाँव की जिंदगी का हिस्सा था।
लेकिन आज सब बदल गया था। उसके किनारे वीरान पड़े थे। जहाँ कभी लोगों के कदमों के निशान बनते थे, वहाँ अब झाड़ियों ने अपनी जगह बना ली थी। तालाब को शायद सबसे अधिक दुख इस बात का था कि वह आज भी वहीं था, उसका पानी आज भी आसमान को अपने भीतर समेटे हुए था, लेकिन उसे देखने और उसके किनारे बैठने वाले लोग कहीं दूर चले गए थे।
तालाब की उदासी को देखकर बूढ़ा बरगद भी अपने भीतर की यादों को रोक नहीं पाया। उसकी झुकी हुई शाखाएँ जैसे वर्षों का बोझ लिए खड़ी थीं। उसे भी वह समय याद था जब उसकी छाँव के नीचे पूरा गाँव इकट्ठा हुआ करता था। दोपहर की तेज धूप में किसान उसके नीचे बैठकर आराम करते थे। बुजुर्ग घंटों तक गाँव की बातें करते रहते थे और बच्चे उसकी डालियों पर झूला झूलते थे।
बरगद को आज भी लगता था कि उसकी किसी पुरानी डाल पर बच्चों की हँसी अटकी हुई है। कभी-कभी हवा चलती तो उसकी शाखाएँ हिलतीं और उसे भ्रम होता कि शायद कोई बच्चा फिर से झूला झूल रहा है। लेकिन जब वह अपनी सूनी छाँव को देखता, तो उसे केवल खामोशी दिखाई देती।
उसकी छाँव आज भी वैसी ही थी, लेकिन उसमें बैठने वाले लोग नहीं थे।
तालाब और बरगद अपने बीते दिनों को याद कर ही रहे थे कि सूखा हुआ कुआँ भी जैसे अपने भीतर की पीड़ा को और अधिक समय तक छिपा नहीं पाया। कभी उसके भीतर मीठे पानी का अथाह स्रोत हुआ करता था। सुबह से शाम तक लोग उसके पास आते रहते थे। कोई अपने घर के लिए पानी भरता, कोई अपने पशुओं की प्यास बुझाता। किसानों के लिए उसका पानी उम्मीद था, क्योंकि उसी पानी से खेतों की हरियाली जुड़ी थी।
कुएँ को याद था कि किस तरह लोग उसके पास आते समय खाली हाथ होते थे और लौटते समय पानी से भरी बाल्टियाँ लेकर जाते थे। उसे अच्छा लगता था कि उसके भीतर का पानी किसी की प्यास बुझाता है, किसी घर की रसोई तक पहुँचता है और किसी खेत को सूखने से बचा लेता है।
लेकिन आज उसके भीतर पानी नहीं था।
जिस गहराई में कभी जीवन था, वहाँ अब कचरे का ढेर पड़ा था। जिस कुएँ के पानी को कभी लोग मीठा कहते थे, आज उसमें पानी की एक बूंद भी नहीं बची थी। वह सूख चुका था, लेकिन शायद उससे भी अधिक दुखद यह था कि किसी ने उसके सूखने पर ध्यान ही नहीं दिया।
तीनों उस शाम बहुत देर तक खामोश रहे।
तालाब को अपने किनारों की रौनक याद आ रही थी। बरगद को बच्चों के झूले और गाँव की बैठकों की आवाज़ें याद आ रही थीं। कुएँ को अपने मीठे पानी और लोगों की जरूरतें याद आ रही थीं।
वे तीनों शायद बूढ़े नहीं हुए थे, बल्कि समय के साथ अकेले हो गए थे।
गाँव आगे बढ़ गया था। लोगों के घर बदल गए थे, जीवन बदल गया था, जरूरतें बदल गई थीं। नई सड़कें बन गई थीं, नल आ गए थे, मोटर और मशीनें आ गई थीं। विकास के साथ बहुत कुछ नया जुड़ गया, लेकिन शायद इसी दौड़ में कुछ पुराना पीछे छूट गया।
पीछे छूट गया वह तालाब, जिसमें कभी बचपन तैरा करता था।
पीछे छूट गया वह बरगद, जिसकी छाँव में कभी पूरा गाँव एक परिवार जैसा लगता था।
और पीछे छूट गया वह कुआँ, जिसका पानी कभी केवल लोगों की प्यास नहीं बुझाता था, बल्कि पूरे गाँव के जीवन को सहारा देता था।
उस शाम जब अंधेरा पूरी तरह गाँव पर उतर आया, तो तालाब, बरगद और कुआँ फिर से खामोश हो गए। शायद वे जानते थे कि उनकी बातें सुनने वाला कोई नहीं है।
लेकिन अगर कभी कोई व्यक्ति वर्षों बाद अपने गाँव लौटे और उस पुराने तालाब के किनारे खड़ा हो, उस बूढ़े बरगद की छाँव में कुछ देर बैठ जाए या उस सूखे कुएँ के भीतर झाँक ले, तो शायद उसे भी महसूस हो कि ये केवल मिट्टी, पानी और पेड़ नहीं हैं।
इनके भीतर एक पूरा समय दफन है।
एक पूरा बचपन।
एक पूरा गाँव।
और शायद सबसे बड़ा दुख यही है कि तालाब आज भी वहीं है, बरगद आज भी वहीं खड़ा है और कुआँ आज भी उसी जगह मौजूद है।
बस अब वे किसी का इंतजार करते हैं।
शायद उन लोगों का, जिन्होंने कभी इनके किनारे अपना बचपन बिताया था।
शायद किसी ऐसे व्यक्ति का, जो लौटकर आए और कहे—
**“मैं तुम्हें भूला नहीं हूँ… मुझे आज भी अपना पुराना गाँव याद है।”**
- आदर्श सिंह

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