दिल्ली का PG हादसा सिर्फ एक इमारत के गिरने की घटना नहीं है। उस मलबे के नीचे सिर्फ कुछ लड़के नहीं दबे थे, बल्कि किसी माँ का सपना, किसी पिता का सहारा और कई परिवारों का भविष्य भी दब गया। ऐसे हादसे खत्म हो जाते हैं, लेकिन पीछे रह गए परिवारों का दर्द वर्षों तक जिंदा रहता है।
“एक इमारत हादसे में मलबे के नीचे कई लोग दब गए। लेकिन इस हादसे ने सिर्फ जानें नहीं लीं, बल्कि कई परिवारों की उम्मीदों को भी हमेशा के लिए बदल दिया।”
दिल्ली में एक PG हॉस्टल का गिर जाना केवल एक इमारत का हादसा नहीं है। उसके मलबे में कुछ ईंटें और दीवारें ही नहीं टूटीं, बल्कि न जाने कितने घरों के सपने टूट गए। उन कमरों में रहने वाले लड़के शायद किसी के बेटे थे, किसी के भाई थे, किसी माँ की उम्मीद थे। वे अपने घरों से दूर दिल्ली इसलिए आए होंगे कि पढ़-लिखकर कुछ बन सकें, नौकरी कर सकें और एक दिन अपने परिवार का नाम रोशन कर सकें।
लेकिन शायद उनके माता-पिता ने कभी नहीं सोचा होगा कि जिस शहर में उन्होंने अपने बच्चों को भविष्य बनाने के लिए भेजा है, वहीं से एक दिन उनके भविष्य के खत्म हो जाने की खबर आएगी।
सोचिए, उस माँ पर क्या बीती होगी जिसने अपने बेटे से आखिरी बार कहा होगा—“खाना समय से खा लेना।” उस पिता के दिल पर क्या गुजरी होगी जिसने अपने बेटे को यह सोचकर दिल्ली भेजा होगा कि वहाँ उसका भविष्य सुरक्षित है। लेकिन उन्हें क्या पता था कि उनका बेटा जिस कमरे में सो रहा है, वही कमरा एक दिन उसकी आखिरी जगह बन जाएगा।
और फिर हर हादसे की तरह सवाल उठेंगे।
जिम्मेदार कौन है?
वह व्यक्ति जिसने ऐसी इमारत में बच्चों को रहने दिया?
या वह अधिकारी जिसकी जिम्मेदारी थी कि वह ऐसी इमारतों की जाँच करे?
या फिर हमारी पूरी व्यवस्था, जो अक्सर किसी की मौत के बाद जागती है?
हर बार कुछ लोग मरते हैं, कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर आती हैं, कुछ दिन तक खबरें चलती हैं, नेता संवेदना व्यक्त करते हैं, मुआवज़े की घोषणा होती है और जांच बैठा दी जाती है।
फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है।
लेकिन क्या उन परिवारों के लिए भी सब सामान्य हो जाता है?
क्या एक माँ अपने बेटे की जगह मिलने वाले मुआवज़े से फिर मुस्कुरा सकती है?
क्या एक पिता को कुछ लाख रुपये देकर उसके बेटे के सपनों की कीमत चुकाई जा सकती है?
क्या किसी बहन को यह कहकर चुप कराया जा सकता है कि “जांच चल रही है”?
नहीं।
क्योंकि कुछ नुकसान ऐसे होते हैं, जिनकी भरपाई दुनिया की कोई सरकार नहीं कर सकती।
और मैं बस एक सवाल पूछना चाहता हूँ—
**मैं टैक्स किसलिए देता हूँ?**
क्या इसलिए कि मेरे आसपास की इमारतें सुरक्षित रहें?
क्या इसलिए कि आपातकाल में सरकार और प्रशासन मेरी सुरक्षा के लिए मौजूद हों?
क्या इसलिए कि मेरे देश में रहने वाला एक आम आदमी कम से कम अपने घर या हॉस्टल में सुरक्षित महसूस कर सके?
या फिर इसलिए कि किसी Emergency में मेरी सरकार और प्रशासन से पहले…
**मेरी Grocery Delivery वाली App मेरी जान बचाने पहुँच जाए?**
यह बात जितनी मज़ाक लगती है, उससे कहीं ज्यादा दुखद है।
आज तकनीक इतनी तेज़ हो गई है कि कुछ मिनटों में हमारे घर का सामान पहुँच सकता है, लेकिन जब किसी इंसान की जान बचाने की बात आती है तो हमारी व्यवस्था अक्सर देर से पहुँचती है।
हमें सुविधा मिल रही है, लेकिन सुरक्षा कहाँ है?
हमारे शहर चमक रहे हैं, लेकिन क्या उनमें रहने वाले लोग सुरक्षित हैं?
बड़ी-बड़ी इमारतें बन रही हैं, लेकिन क्या उनकी नींव में जिम्मेदारी भी है?
आखिर कब तक किसी माँ की गोद उजड़ती रहेगी?
कब तक किसी पिता के सपने मलबे के नीचे दबते रहेंगे?
कब तक हम हर हादसे के बाद केवल मोमबत्ती जलाकर, ट्वीट करके और दुख जताकर आगे बढ़ जाएंगे?
हमें हर मौत के बाद संवेदना नहीं चाहिए।
**हमें हर मौत से पहले सुरक्षा चाहिए।**
हमें मुआवज़ा नहीं चाहिए।
**हमें जवाबदेही चाहिए।**
क्योंकि किसी देश की सबसे बड़ी विडंबना तब होती है, जब उसका नागरिक टैक्स तो पूरी ईमानदारी से देता है…
लेकिन बदले में उसे अपनी जान की सुरक्षा का भरोसा भी नहीं मिलता।
और शायद सबसे दर्दनाक सवाल यही है—
**आखिर एक आम आदमी अपने घर से बाहर निकले तो किस भरोसे निकले?**
सरकार के भरोसे?
प्रशासन के भरोसे?
व्यवस्था के भरोसे?
या फिर…
**किसी Grocery Delivery वाली App के भरोसे?**
- आदर्श सिंह

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